From 5df6896fb73cd722b065760d50e5675cece1ffc5 Mon Sep 17 00:00:00 2001 From: Vachaa Date: Tue, 12 Nov 2024 11:04:39 +0530 Subject: [PATCH] Tue Nov 12 2024 11:04:38 GMT+0530 (India Standard Time) --- 02/17.txt | 2 +- 02/21.txt | 1 + manifest.json | 3 ++- 3 files changed, 4 insertions(+), 2 deletions(-) create mode 100644 02/21.txt diff --git a/02/17.txt b/02/17.txt index 14613e8..cfd72b2 100644 --- a/02/17.txt +++ b/02/17.txt @@ -1 +1 @@ -\v 17 \v 18 \v 19 \v 20 17 यदि तू स्वयं को यहूदी कहता है, व्यवस्था पर भरोसा रखता है, परमेश्‍वर के विषय में घमण्ड करता है, 18 और उसकी इच्‍छा जानता और व्यवस्था की शिक्षा पा कर उत्तम-उत्तम बातों को प्रिय जानता है; \v 19 यदि तू अपने पर भरोसा रखता है, कि मैं अंधों का अगुआ, और अंधकार में पड़े हुओं की ज्योति, \v 20 और बुद्धिहीनों का सिखानेवाला, और बालकों का उपदेशक हूँ, और ज्ञान, और सत्य का नमूना, जो व्यवस्था में है, मुझे मिला है। \ No newline at end of file +\v 17 यदि तू स्वयं को यहूदी कहता है, व्यवस्था पर भरोसा रखता है, परमेश्‍वर के विषय में घमण्ड करता है, \v 18 और उसकी इच्‍छा जानता और व्यवस्था की शिक्षा पा कर उत्तम-उत्तम बातों को प्रिय जानता है; \v 19 यदि तू अपने पर भरोसा रखता है, कि मैं अंधों का अगुआ, और अंधकार में पड़े हुओं की ज्योति, \v 20 और बुद्धिहीनों का सिखानेवाला, और बालकों का उपदेशक हूँ, और ज्ञान, और सत्य का नमूना, जो व्यवस्था में है, मुझे मिला है। \ No newline at end of file diff --git a/02/21.txt b/02/21.txt new file mode 100644 index 0000000..b5389cf --- /dev/null +++ b/02/21.txt @@ -0,0 +1 @@ +\v 21 क्या तू जो औरों को सिखाता है, अपने आप को नहीं सिखाता? क्या तू जो चोरी न करने का उपदेश देता है, आप ही चोरी करता है? (मत्ती 23:3) \v 22 तू जो कहता है, “व्यभिचार न करना,” क्या आप ही व्यभिचार करता है? तू जो मूरतों से घृणा करता है, क्या आप ही मन्दिरों को लूटता है? \ No newline at end of file diff --git a/manifest.json b/manifest.json index 14c73fd..bbcff59 100644 --- a/manifest.json +++ b/manifest.json @@ -60,6 +60,7 @@ "02-08", "02-10", "02-13", - "02-15" + "02-15", + "02-17" ] } \ No newline at end of file